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पाठ 6 खेत से बाज़ार तक

 प्रश्न 1.प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न. आपके आसपास के क्षेत्र में कौन-कौन सी फसलों की खेती होती है?

उत्तर. हमारे आसपास मुख्य रूप से धान, गेहूं, गन्ना, सरसों इत्यादि की खेती होती है । इसके अतिरिक्त तरह-तरह की सब्जियां जैसे आलू , टमाटर,  गोभी,  बैगन, मूली,  गाजर इत्यादि, साथ में दलहन फसलें जैसे- अरहर, मसूर, मटर, उड़द आदि की खेती होती है । हमारे आसपास कुछ फलों की भी खेती होती है जैसे- केले की खेती, आम की खेती, अमरूद की खेती और कहीं-कहीं नींबू भी उगाए जाते हैं।


प्रश्न. धान की पिटाई कैसे की जाती है?

उत्तर. धान की फसल पक जाने पर उसे काटकर धूप में सुखाते हैं। उसके बाद लकड़ी के पट्टे पर पीट-पीट कर धान को अलग किया जाता है आजकल यह काम मशीन के द्वारा भी किया जाता है।


प्रश्न. किसी एक फसल को बोने से लेकर बाजार में बेचने तक की प्रक्रिया को लिखिए।

उत्तर. धान की खेती:- धान खरीफ़ की मुख्य फसल है। धान की फसल तैयार करने के लिए सबसे पहले धान के बीजों को अंकुरित करके धान की नर्सरी (बेहन) तैयार किया जाता है लगभग 25 से 30 दिन के बाद, खेत में पानी भर के तैयार बेहन को उसमें रोपा जाता है। कुछ दिनों के बाद धान के साथ उग आए खरपतवार को निराई करके खेत से बाहर निकाला जाता है । इसके बाद समय-समय पर सिंचाई की जाती है। कुछ दिनों बाद धान की फसल पक जाने पर उसे काट कर धूप में सुखाया जाता है। बाद में लकड़ी के पट्टे पर पीट-पीट कर धान को अलग किया जाता है और अंत में इकट्ठा की गई धान की फसल को मंडी तक पहुंचाया जाता है।


किसान / बड़ों से पता करके लिखिए- 

प्रश्न. गेहूं की बुवाई एवं कटाई किस माह में की जाती है?

उत्तर. गेहूं की बुवाई प्रायः दो समय - अवधि में की जाती है- 1) अगेती गेहूं और 2) पछेती गेहूं। अगेती गेहूं की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक होती है . वही पछेती गेहूं की बुवाई अक्सर किस गन्ना और आलू की खुदाई करने के बाद करते हैं जिसकी बुवाई 15 दिसंबर से 15 जनवरी तक होती है।

  गेहूं की फसल तैयार होने का समय गेहूं के किस्मों पर निर्भर करता है. इसके कटाई की बात करें तो आमतौर पर मध्य मार्च से आधे अप्रैल के बीच की जाती है. कई बार अप्रैल के आखिर तक भी कटाई की जाती है।


प्रश्न. गेहूं की फसल खराब होने के क्या-क्या कारण होते हैं?

उत्तर. वैसे तो गेहूं की फसल को खराब करने में रतुवा (गेरुआ) नामक रोग सबसे अधिक भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त तेज हवा, बारिश और ओले पड़ने के कारण भी फसल ख़राब हो जाती है।


प्रश्न. इनको खराब होने से बचने के लिए किस क्या-क्या तरीके अपनाते हैं?

उत्तर. गेहूं की फसल को रोग से बचाने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके गेहूं की बुवाई की जाती है। पाले से बचाने के लिए किसान फसल में हल्की सिंचाई करते हैं । शाम के समय सूखी घास फूस एवं उपलों को जलाकर उसका धुआं करते हैं ।


प्रश्न . गेहूं की फसल कितने दिनों में पक जाती है?

उत्तर. सामान्य बुवाई (अगेती) में इसके पकने का समय 120 से 125 दिन है जबकि पिछेती बुवाई में यही किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है ।


3. खोजबीन

प्रश्न. आपके मन में खेती से जुड़े क्या-क्या सवाल उठते हैं? कुछ सवालों की सूची बनाइए और अपने पिताजी या किसान से पूछिए।

उत्तर. विद्यार्थी स्वयं अपने प्रश्नों को अपने बड़े बुजुर्गों से पूछ कर उत्तर प्राप्त करें।


प्रश्न. खेती में काम आने वाले कुछ औजारों के नाम अपने बड़ों से पूछ कर लिखिए और उनके चित्र बनाइए।

उत्तर. खेती में काम आने वाले कुछ प्रमुख औजार हैं -  कुदाल, फावड़ा, खुरपी, हंसिया, गंडासा आदि। विद्यार्थी इन औजारों के चित्र अपनी उत्तर पुस्तिका पर बनाएं।


समाप्त

पर्यावरण कक्षा 4, पाठ 4, हमारा भोजन, अभ्यास प्रश्नों का हल

 प्रश्न.1 पौधों से प्राप्त होने वाले किन्ही चार भोज्य पदार्थों के नाम लिखिए?

उत्तर.1 पौधों से प्राप्त होने वाले चार भोज्य पदार्थ निम्नलिखित हैं -

1) तरह-तरह के अनाज, जैसे- गेहूं, ज्वार, मक्का, धान आदि।

2) तरह-तरह की दालें, जैसे- चना, अरहर, मूंग, मसूर आदि।

3) विभिन्न प्रकार की सब्जियां, जैसे- आलू, लौकी, टमाटर, गाजर आदि।

4) तरह-तरह के फल, जैसे- सेव, आम, केला, अमरूद आदि।


प्रश्न 2. जंतुओं से प्राप्त होने वाले किन्ही चार भोज्य पदार्थों के नाम लिखिए?

 उत्तर 2. जंतुओं से प्राप्त होने वाले चार प्रमुख पदार्थ निम्नलिखित हैं -

1) अंडा  2) दूध  3) मांस  4) मछली।


प्रश्न 3. रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए-

क) भोजन से हमें ऊर्जा मिलती है।

 ख) भोजन के रूप में जिन्हें हम कहते हैं वह भोज्य पदार्थ कहलाते हैं।

 ग) भोजन के प्रमुख स्रोत पौधे और जंतु हैं।


प्रश्न 4. सही कथन के सामने (✓) और गलत के सामने (×) का निशान लगाएं-

क) अनाज दालें व सब्जियां पौधों से प्राप्त होती हैं। (✓)

ख) गेहूं की बुआई ग्रीष्म ऋतु में करते हैं ।(×)

ग ) स्वस्थ रहने के लिए संतुलित भोजन करना चाहिए।(✓)


प्रश्न 5. क) अपने दादा-दादी या मम्मी पापा से पूछिए कि जब वे आपकी उम्र के थे तो क्या खाते थे? अब लिखिए कि आप अपने दादा-दादी से क्या-क्या भिन्न चीज खाते हैं?

उत्तर 5. क) विद्यार्थी अपने परिवार वालों से पूछ कर इस प्रश्न का उत्तर स्वयं लिखें।


प्रश्न 5 ख) अपने घर में भोजन पकाते समय प्रयोग किए जाने वाले मसालों की सूची तैयार कीजिए।

प्रश्न 5 ख) विद्यार्थी अपने परिवार वालों से बात चीत करके इस प्रश्न का उत्तर स्वयं लिखें।




समाप्त

ज़िन्न




 कमल एक बुद्धिमान युवक था। एक बार वह कहीं जा रहा था। रात होने वाली थी। वह तेज़ी से चलकर जा रहा था। तभी उसने एक हल्की-सी आवाज़ सुनी। कोई कह रहा था - 'बचाओ, बचाओ, मुझे बाहर निकालो।'


कमल ने इधर-उधर देखा। उसे कोई दिखाई नहीं दिया। वह आगे जाने लगा। तभी वही आवाज़ फिर आई। कमल ने ध्यान से देखा तो उसे पेड़ के नीचे एक बोतल पड़ी हुई दिखाई दी। उसे लगा कि आवाज़ बोतल के अंदर से आ रही है। कमल ने बोतल को उठाकर देखा। उसके अंदर उसे एक छोटा-सा चेहरा दिखाई दिया। अंदर कोई बंद था चिल्ला रहा था। 'बचाओ-बचाओ, मुझे यहाँ से बाहर निकालो।'


कमल ने बोतल का ढक्कन खोल दिया। अचानक अंदर से ढेर सारा धुँआ निकला और साथ ही वह व्यक्ति भी। बाहर निकलते ही उसका आकार बहुत बड़ा हो गया। उसने कमल से कहा, 'मैं एक जिन्न हूं। एक दुष्ट जादूगर ने उसे इस बोतल में बंद कर दिया था। अब मैं आज़ाद हो गया हूं। मुझे बहुत भूख लगी है। अब मैं तुम्हें खाऊँगा।'


यह सुनकर कमल थोड़ा घबराया। लेकिन उसने जिन्न को पता नहीें लगने दिया कि उसे डर लग रहा है। उसने जिन्न से कहा, 'तुम मुझे बेवकूफ़ नहीं बना सकते। ज़रा अपना आकार तो देखो। और यह बोतल देखो। तुम इतने बड़े होकर इस बोतल के अंदर भला कैसे आ सकते हो।‘ तुम झूठ बोल रहे हो।'


यह सुनकर जिन्न को गुस्सा आ गया। वह बोला, 'जिन्न कभी झूठ नहीं बोलते। तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है न, ठीक है मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि मैं इस बोतल के अंदर जा सकता हूँ।'


ऐसा कहकर उसने अपना आकार छोटा किया और धुँआ बनकर बोतल के अंदर चला गया।


कमल तो यही चाहता था। उसने झट से बोतल का ढक्कन वापिस लगा दिया।


फिर कमल उस जिन्न से बोला- 'मैं जान गया हूँ कि जिन्न झूठ नहीं बोलते, लेकिन थोड़े बेवकूफ़ जरूर होते हैं। अब तुम यहीं रहो, इसी बोतल के अंदर।'


कमल ने वह बोतल एक पत्थर से बाँधी और समुद्र में फेंक दी। भारी पत्थर से बँधी होने के कारण बोतल पानी में डूब गई और साथ ही जिन्न भी।


एक बात तो तुम समझ गए होगे कि मुसीबत के समय घबराने से कुछ हल नहीं होता। इसलिए अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए, जैसे कमल ने किया।

हाँ दीदी हाँ : उत्तराखंड की लोक-कथा

 किसी पहाड़ी गांव में एक निर्धन किसान का परिवार रहता था। किसान की एक बेटी और एक बेटा था। किसान की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। अपने दोनों बच्चों का लालन पोषण वह स्वयं करता था। समय के साथ साथ बच्चे बड़े हो गये। बेटी बड़ी थी सो किसान को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। उसने पाई पाई जोड़कर जैसे तैसे उसका विवाह कर दिया।


एक दो साल बाद किसान बिमार रहने लगा। और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई । अब उसका बेटा अनाथ हो गया, उसकी दीदी को अब भाई की चिंता सताने लगी। क्योंकि उसका ससुराल भी ज्यादा सम्पन्न नहीं था तो वह अपने सास ससुर व पति से इस बारे में बात करने में संकोच होने लगा। परन्तु भाई की चिंता में उसने हिम्मत बांध के भाई को अपने ससुराल में ही रखने की बात ससुरालियों से की। ससुराल वाले बहू की बात मान तो ली परन्तु कुछ शर्तों के साथ। ये शर्तें थी -

(1) उसके भाई को भोजन में भूसे की रोटी और बिच्छू का साग (बिच्छू एक प्रकार की पहाड़ी घास होती है जो सब्जी बनाने के काम भी आती है)।
(2) उसे चक्की की ओट में सोना होगा,
(3) मवेशियों को चराने की जिम्मेदारी उसकी होगी।

बहन को ये बातें बिल्कुल भी उचित नहीं लगी परन्तु भाई प्रेम और उसकी अकेले रहने की चिंता में उसने यह शर्तें मान ली। भाई ने भी परिस्थिति के अनुसार मन पसीज के यह शर्तें मान ली। अब भाई अपनी बहन के ससुराल में रहने लगा।

धीरे धीरे भाई अब उस परिवेश में घुल मिल गया। वह दिन में मवेशियों को चराने जंगल जाता और रात को भोजन में मिली भूसे की रोटी और बिच्छू की सब्जी खाकर वहीं चक्की की ओट पर टाट बोरी बिछा के सो जाता। ऐसे ही वक्त बीतता गया।

एक दिन मवेशियों को जंगल में चराते चराते उसे एक अंजान व्यक्ति मिला। उस व्यक्ति ने उसे उसके साथ चलने को कहा। पहले तो उसने साथ आने से मना किया परन्तु जब उस अजनबी ने उसे अच्छा काम और अच्छे भविष्य का लोभ दिखाया तो वह सोचने लगा कि बहन के घर में बोझ बनने से अच्छा कहीं और काम करके धन कमाया जाये। उसने साथ चलने की हामी भर दी।

शाम को जब भाई नहीं लौटा तो बहन को चिंता होने लगी। गांव में भी बात फैल गई। उसकी खोजबीन की गई जब वह नहीं मिला तो सबने उसे मृत समझ लिया। बहन बहुत दुखी रहने लगी। उसे यकीन नहीं हुआ कि उसका भाई मर चुका है। खैर दिन महिने साल निकलते रहे। धीरे धीरे वह अपने भाई को भुलाती रही लेकिन तीज त्यौहारों में जब आस पड़ोस की औरतें अपने भाई से मिलने जाती या उनके भाई उनसे मिलने आते तो वह अपने भाई को याद करके आंसू बहाती। ऐसी समय निकलता रहा और एक दिन उसे उसके भाई का संदेश मिला, वह फूली नहीं समाई। जिसे वह मरा समझ चुकी थी वह जिंदा था। वह भाई से मिलने अपने मायके गई।

घर पहुंच कर उसे भाई की संपन्नता देखकर कर आश्चर्य हुआ। भाई ने उसे भूतकाल में जो भी हुआ सब बताया। दोनों एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुये। भाई ने उपहार स्वरूप बहन को बहुत धन दिया लेकिन उसकी बहन ने यह कहकर मना कर दिया कि उसे उसका भाई मिल गया उसे अब कुछ नहीं चाहिये। जब उसने धन लेने से मना किया तो भाई ने उसे दो गायें और एक भैंस देनी चाही। तो बहन ने वह रख ली। भाई खुश हुआ कि बहन ने उसकी एक उपहार स्वीकार कर लिया। उसने गाय के गले में घंटी बांध दी और बहन के साथ भेज दिया।

बहन उन गायें और भैंस के साथ ससुराल को चल दी। सुनसान रास्ते में गाय के गले में बंधी घंटी का स्वर बहन को अच्छा लग रहा था। उसे लगा जैसे घंटी से आवाज आ रही हो-

भूसे की रोटी, सिंसूण की साग खाएगा - हाँ दीदी
चक्की की ओट में सोएगा - हाँ दीदी
झाड़ू की मार सहेगा - हाँ दीदी हाँ ।
घंटी मानो यहीं बाते बोल रही हो यह सोचकर वह जोर जोर से हंस पड़ी।

बीरा बैण (बहन) : उत्तराखंड की लोक-कथा

 बहुत पुरानी बात है। उत्तराखंड के जंगल में एक विधवा बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे और एक प्यारी-सी बेटी थी । बेटी का नाम था बीरा। कुछ दिनों बाद जब बुढ़िया की मृत्यु हो गई, तो उसके ये बच्चे अनाथ हो गए। सातों भाई शिकार खेलने के शौकीन थे।


एक दिन वे सातों भाई मिलकर एक साथ शिकार खेलने निकले। उन्होंने चलते-चलते अपनी बहन बीरा से कहा-तुम हमारे लिए भोजन बनाकर रखना, हम जल्दी लौट कर आ जाएंगे।

भाइयों के जाने के बाद झोंपड़ी में बीरा अकेली रह गई। बीरा ने आग जलाकर खीर बनाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद खीर उबल कर चूल्हे में गिर गई। इससे आग बुझ गई।

बीरा बहुत परेशान हुई। उसके पास माचिस भी नहीं थी, वह आग कैसे जलाती? उसके आस-पास कोई घर भी नहीं था। अब वह आग कहां से मांग कर लाए? वह अपनी झोंपड़ी से निकल कर जंगल में दूर तक निकल गई। देखने लगी कि कोई घर मिले, तो वहां से आग मांग ले।

चलते-चलते उसे एक बड़ा-सा मकान दिखाई दिया। उसने मकान के सामने जाकर उसका दरवाजा खटखटाया। दरवाजा एक औरत ने खोला। औरत ने बीरा को देखकर कहा-‘तुम यहां से चली जाओ। यह राक्षस का घर है। वह अभी आने वाला है। तुम्हें देखेगा, तो तुम्हें खा जाएगा।’

बीरा ने कहा-‘बहन! मुझे थोड़ी-सी आग चाहिए। खाना बनाना है। बड़ी जोर की भूख लगी है।’

वह औरत राक्षस की पत्नी थी, लेकिन जब बीरा ने उसे बहन कहा, तो उसे बीरा पर दया आ गई। उसने बीरा को जल्दी से थोड़ी-सी आग दे दी। उसने उसे चौलाई भी दी और कहा-‘तुम यहां से जल्दी निकल जाओ। ऐसा करना कि रास्ते में इस चौलाई के दानों को गिराती जाना। जहां भी दो रास्ते मिलें, वहां के बाद चौलाई मत गिराना। इससे राक्षस रास्ता भटक जाएगा और तुम्हारे घर तक नहीं पहुंच सकेगा। याद रखना इस चौलाई को अपने घर तक मत ले जाना, नहीं तो राक्षस वहीं पहुंच जाएगा।’

बीरा अपने साथ चौलाई ले गई और उसके दाने रास्ते में गिराती गई। वह जल्दी-जल्दी जा रही थी। वह राक्षस की पत्नी की बात भूल गई। उसने पूरे रास्ते पर चौलाई के दारे गिरा दिए। कुछ दाने अपने घर तक भी ले गई।

जब राक्षस अपने घर लौट कर आया, तो उसे मनुष्य की गंध आने लगी। वह समझ गया कि आज जरूर कोई मनुष्य मेरे घर आया है। उसने अपनी पत्नी से पूछा- ‘आदमी की गंध आ रही है, क्या कोई आदमी हमारे घर आया था?’

उसकी पत्नी ने कहा-‘नहीं तो। यहां तो कोई नहीं आया।’

राक्षस ने अपनी पत्नी को पहले तो खूब डांटा। फिर मारना-पीटना शुरू कर दिया। डर के मारे उसकी पत्नी ने राक्षस को बीरा के आने की बात बता दी। सुनते ही वह राक्षस बीरा की तलाश में निकल पड़ा। वह चौलाई के बीज देखता हुआ बीरा की झोंपड़ी तक पहुंच गया। झोंपड़ी में बीरा अकेली थी। तब तक उसके भाई नहीं लौटे थे। उसने अपने भाइयों के लिए खाना बनाकर सात थालियों में परोस कर रखा हुआ था। राक्षस को देखकर वह डर गई और पानी के पीपे में छिपकर बैठ गई। राक्षस ने सारा खाना खा लिया। खाने के बाद वह पानी के पीपे की ओर गया। सारा पानी पीने के बाद उसने खाली पीपे में बैठी बीरा को पकड़ लिया। वह बीरा को जीवित निगल गया।

खा-पीकर राक्षस झोंपड़ी के दरवाजे पर सो गया, क्योंकि उसे बहुत जोर की नींद आ रही थी। जब बीरा के भाई लौटकर आए, तो उन्होंने राक्षस को दरवाजे पर सोते हुए पाया। उन्होंने देखा बीरा घर में नहीं है। वे समझ गए कि जरूर इस राक्षस ने हमारी बीरा बहन को खा लिया है। उन्होंने तुरंत राक्षस के हाथ-पैर काट डाले। फिर उसका पेट फाड़ दिया। राक्षस मर गया और उसके पेट से बीरा भी निकल आई।

इसके बाद वे भाई-बहन सुख पूर्वक रहने लगे। जब भी वे कभी बाहर जाते, तो कोई न कोई भाई बीरा के पास जरूर रह जाता था।

फूलों की घाटी : उत्तराखंड की लोक-कथा

 बहुत पुरानी बात है। हिमालय पर्वत की घाटी में एक ऋषि रहते थे। वे गोरे-चिट्टेथे, उनकी श्वेत धवल दाढ़ी था और कंद, मूल, फल खाते थे । अपना अधिक समय वह तपस्या में व्यतीत करते थे। कभी-कभी बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच अकेले वह उदास हो जाते। उदासी तोड़ने के लिए अक्सर वह जोर से बोलने लगते। उन्हीं की आवाज ऊंचे पर्वतों से टकराकर लौट आती। दूर-दूर तक नजर दौड़ाकर वह कुछ खोजने लगते। चारों ओर दूध-सी सफेद बर्फ ही दिखाई देती। उनका मन और उदास हो जाता।


एक दिन उन्होंने ध्यान लगाकर भगवान से कहा, ‘प्रभु कभी-कभी मन नहीं लगता, सूने पहाड़ की उदासी काटने लगती है। कुछ कृपा करो।’

ऋषि अभी ध्यानमग्न ही थे, तभी उन्हें छम-छम करती पायल की झंकार सुनाई दी। उन्होंने आंखे खोलीं। देखा, हिम-सी एक बालिका श्वेत वस्त्रों से सजी सामने खड़ी थी। मंत्रमुग्ध ऋषि ने दौड़कर बच्ची को गोद में उठा लिया। उनका हृदय पुलकित हो उठा। खुशी में आंखों से आंसू बहने लगे।
ऋषि के आंसू बहते देख, बच्ची मीठी वाणी में बोली, ‘बाबा रोते क्यों हो?’
‘मैं रो नहीं रहा हूं। ये खुशी के आंसू हैं मेरी बच्ची। बताओ, तुम कहां से आई हो? तुम्हारा नाम क्या है? तुम किसकी बेटी हो?’ ऋषि ने पूछा।
बच्ची बोली, ‘मैं नीचे की घाटियों से आई हूं। मेरी मां ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मेरी मां का नाम प्रकृति है। मेरा नाम है सुषमा।’
‘तुम कब तक मेरे पास रहोगी? मुझे लगता है, अब एक बार तुम्हें पा लिया तो मैं एक क्षण भी तुम्हारे बिना न रह सकूंगा। अब तुम मुझे छोड़कर कभी न जाना।’ कहते हुए वृद्ध ऋषि विभोर हो गए।

‘मैं तुम्हारे पास ही रहूंगी बाबा। मेरी मां ने कहा है, उदास ऋषि के चारों तरफ खुशी बिखेर देना, ताकि कभी किसी को भी भविष्य में हिमालय में उदासी न घेरे। मैं कभी भी तुम्हें छोड़कर न जाऊंगी। आज से तुम मेरे बाबा हो। यह हिमालय मेरा घर है।’ बच्ची ने कहा। ऋषि प्रसन्न थे। वह बच्ची का हाथ थामे, बर्फानी पर्वतों पर घूमते। कभी उसे गोद में लिए मीलों चलते। दोनों प्रसन्न थे। अक्सर ऋषि बालिका को कथा सुनाते।

एक दिन ऋषि ने बालिका को हंसने वाली मनोरंजक कथा सुनाई, तो वह खिलखिला कर हंस दी। जब वह खिलखिल हंस रही थी, तो ऋषि उसी तरफ देख रहे थे। बच्ची की हंसी के साथ रंग-बिरंगे, सुंदर फूल झर रहे थे। वह मंद हवा के साथ दूर-दूर तक फैलते जा रहे थे। थोड़ी देर में बच्ची ने हंसना बंद किया। तब तक दूर-दूर तक फूल ही फूल धरती पर उग आए थे। ऋषि ने दूर तक देखा और मुसकुराकर कहा, ‘यही है फूलों की घाटी। इस धरती का स्वर्ग।’

फूलों के सौंदर्य में डूबे ऋषि बालिका के साथ घूमते रहे। एक दिन उनकी अंगुली पकड़े बालिका ठुमक-ठुमक कर चल रही थी, तभी एकाएक उसका पैर फिसला और उसे चोट आ गई। कोमल तो वह थी ही। ऊं…ऊं… करके रोने लगी। बड़ी-बड़ी आंखों से मोती से आंसू ढुलक-ढुलक कर धरती पर गिरने लगे। ऋषि ने उसे संभाला। चोट को सहलाया। बच्ची चुप हुई, तो ऋषि ने देखा कि जहां-जहां आंसू की बूंदे गिरी थीं, वहां जल धाराएं बह रही हैं। निर्झर झर रहे हैं। ऋषि जैसे तृप्त हो गए, उस दृश्य को देखकर।

सचमुच बच्ची ने ऋषि की उदासी मिटा दी। मुदित मन से ऋषि उसे लिए ऊंची चोटियों पर, यहां से वहां जाते। जहां बच्ची हंसती, वहां फूल बिखर जाते, जहां रोती, वहां झरने बहते, अब सुंदरता हिमालय पर सर्वत्र छा गई। ऋषि की उदासी दूर हो गई। बाबा और बच्ची दोनों मगन थे।

समय बीतने लगा। बहुत-बहुत वर्षों बाद बर्फानी पर्वतों, फूलों की घाटियों और नदी-झरनों के नीचे की घाटियों में रहने वालों को इस अनोखे सौंदर्य की खबर मिली। वे लोग मार्ग खोज-खोज कर ऊपर जाने लगे। कठिन मार्ग में उन्हें थकावट लगती, कष्ट होता, पर ऊपर पहुंचकर सब भूल जाते। धीरे-धीरे अपने मार्ग के कष्ट को दूर करने के लिए उन्होंने अच्छा सुगम मार्ग बनाने का विचार किया। हरी-भरी धरती पर लगे कुदाल चलाने। कभी सह लेती धरती मां, पर कभी गुस्से से गरज पड़ती और पहाड़ टूट जाते। हरियाली पर टूटा पहाड़ मनुष्य की निर्दयता की कहानी कहता।

लोग आने लगे, ऋषि और बालिका ऊंची-ऊंची चोटियों की ओर बढ़ने लगे। वे जहां जाते, सूखे पर्वत सौंदर्य से भर जाते। इस तरह ऋषि ने सुषमा को साथ लगाकर हिमालय को स्वर्ग के समान बना दिया। आज ऋषि नहीं है, मगर हिमालय के झरनों, हरे मैदानों और फूलों की घाटी के रूप में सुषमा चारों ओर जैसे हंसती-मुसकुराती ऋषि की कहानी कहती दीख पड़ती है।

धान की कहानी : उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

 एक बार ब्राह्मण टोला के निवासियों को किसी दूर गांव से भोजन के लिए निमंत्रण आया। वहां के लोग बहुत प्रसन्न हुए और जल्दी-जल्दी दौड़-भागकर उस गांव में पहुंच गए। वहां सबने जमकर भोजन का आनन्द उठाया। खूब छककर खाया।


भोजन करने के बाद सब लोग अपने घर की ओर चल दिये। पैदल ही चले क्योंकि सवारी तो थी नहीं। रास्ते में चावल के खेत लहलहा रहे थे। यह देखकर उनमें से किसी से रहा नहीं गया।

सबने आव देखा ना ताव और टूट पडे चावल पर। हाथ से चावल के बाल अलग करते, और मुंह में डाल लेते। उसी रास्ते से शिव व पार्वती भी जा रहे थे। इस तरीके से उन लोगों को खाते देख पार्वती ने शिवजी से कहा- 'देखिए, ये लोग भोज खाकर आ रहे हैं, फिर भी कच्चे चावल चबा रहे हैं।'

शिवजी ने पार्वती की बात अनसुनी कर दी । पार्वती ने सोचा, मैं ही कुछ करती हूं। सोच-विचार के बाद उन्होंने शाप दिया कि चावल के ऊपर छिलका हो जाए। तभी से खेतों में चावल नहीं धान उगने लगे।

टिपटिपवा : उत्तर प्रदेश की लोक-कथा


 एक थी बुढ़िया। उसका एक पोता था। पोता रोज़ रात में सोने से पहले दादी से कहानी सुनता। दादी रोज़ उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती।



एक दिन मूसलाधार बारिश हुई। ऐसी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी। सारा गाँव बारिश से परेशान था। बुढ़िया की झोंपड़ी में पानी जगह-जगह से टपक रहा था—- टिपटिप टिपटिप । इस बात से बेखबर पोता दादी की गोद में लेटा कहानी सुनने के लिए मचल रहा था। बुढ़िया खीझकर बोली—“अरे बचवा, का कहानी सुनाएँ? ई टिपटिपवा से जान बचे तब न !


पोता उठकर बैठ गया। उसने पूछा- दादी, ये टिपटिपवा कौन है? टिपटिपवा क्या शेर-बाघ से भी बड़ा होता है?


दादी छत से टपकते पानी की तरफ़ देखकर बोली—हाँ बचवा, न शेरवा के डर, न बघवा के डर, डर त डर टिपटिपवा के डर।


संयोग से मुसीबत का मारा एक बाघ बारिश से बचने के लिए झोंपड़ी के पीछे बैठा था। बेचारा बाघ बारिश से घबराया हुआ था। बुढ़िया की बात सुनते ही वह और डर गया।


अब यह टिपटिपवा कौन-सी बला है? ज़रूर यह कोई बड़ा जानवर है। तभी तो बुढ़िया शेर-बाघ से ज्यादा टिपटिपवा से डरती है। इससे पहले कि बाहर आकर वह मुझपर हमला करे, मुझे ही यहाँ से भाग जाना चाहिये।

बाघ ने ऐसा सोचा और झटपट वहाँ से दुम दबाकर भाग चला।


उसी गाँव में एक धोबी रहता था। वह भी बारिश से परेशान था। आज सुबह से उसका गधा गायब था। सारा दिन वह बारिश में भीगता रहा और जगह-जगह गधे को ढूंढता रहा, लेकिन वह कहीं नहीं मिला।

धोबी की पत्नी बोली – जाकर गाँव के पंडित जी से क्यों नहीं पूछते? वे बड़े ज्ञानी हैं। आगे-पीछे सबके हाल की उन्हें खबर रहती है।


पत्नी की बात धोबी को जँच गई। अपना मोटा लट्ठ उठाकर वह पंडित जी के घर की तरफ़ चल पड़ा। उसने देखा कि पंडित जी घर में जमा बारिश का पानी उलीच-उलीचकर फेंक रहे थे।

धोबी ने बेसब्री से पूछा – महाराज, मेरा गधा सुबह से नहीं मिल रहा है। जरा पोथी बाँचकर बताइये तो वह कहाँ है?


सुबह से पानी उलीचते-उलीचते पंडित जी थक गए थे। धोबी की बात सुनी तो झुंझला पड़े और बोले—मेरी पोथी में तेरे गधे का पता-ठिकाना लिखा है क्या, जो आ गया पूछने? अरे, जाकर ढूंढ उसे किसी गढ़ई-पोखर में।


और पंडित जी लगे फिर पानी उलीचने। धोबी वहां से चल दिया। चलते-चलते वह एक तालाब के पास पहुँचा। तालाब के किनारे ऊँची-ऊँची घास उग रही थी। धोबी घास में गधे को ढूँढने लगा। किस्मत का मारा बेचारा बाघ टिपटिपवा के डर से वहीँ घास में छिपा बैठा था। धोबी को लगा कि बाघ ही उसका गधा है। उसने आव देखा न ताव और लगा बाघ पर मोटा लट्ठ बरसाने। बेचारा बाघ इस अचानक हमले से एकदम घबरा गया।


बाघ ने मन ही मन सोचा – लगता है यही टिपटिपवा है। आखिर इसने मुझे ढूंढ ही लिया। अब अपनी जान बचानी है तो जो यह कहता है, वही करना होगा।


आज तूने मुझे बहुत परेशान किया है । मार मारकर मैं तेरा कचूमर निकाल दूँगा। ऐसा कहकर धोबी ने बाघ का कान पकड़ा और उसे खींचता हुआ घर की तरफ़ चल दिया। बाघ बिना चूं चपड़ किये भीगी बिल्ली बना धोबी के साथ चल दिया। घर पहुँच कर धोबी ने बाघ को खूंटे से बांधा और सोने चला गया।

सुबह जब गाँव वालों ने धोबी के घर के बाहर खूंटे से बंधे बाघ को देखा हैरानी से उनकी आँखें खुली रह गईं।

बौनों का देश : लोक-कथा (अंडमान निकोबार)

 हजारों साल पहले मलक्का के लोग घूमते-घामते एक ऐसी जगह जा पहुँचे जहाँ एक गुफा-सी थी। उसमें इतना अंधेरा था कि वे चाहकर भी उसके भीतर जाने का साहस न कर सके। तब उन्होंने नारियल की कुछ सूखी पत्तियों को इकट्ठा करके उन्हें जलाया। उस प्रकाश में वे उसके भीतर गए। अन्दर उन्हें एक संकरा रास्ता दिखाई पड़ा। उस रास्ते को पार करके वे एक शानदार जगह पर जा पहुँचे।


वास्तव में यह पाताल में बौनों का शहर था। उन्होंने वहाँ ढेर सारी हरी घास और अंडों का अम्बार देखा। ये अंडे बौने चोरों ने पक्षियों के घोंसलों से चुराए थे।

मलक्कावासियों ने उन अंडों को वहाँ से चुराया और अपने घर ले आए। इसके बाद वे जब भी मौका पाते, उस पाताल-गुफा में घुस जाते, अंडों को चुराते और मलक्का लौट आते।
लेकिन एक दिन अंडे चुराते हुए उन्हें बौनों ने पकड़ा लिया।
“तुम लोग कौन हो? और हमारे अंडे क्‍यों चुरा रहे हो?'' बौनों ने पूछा।

“हम पृथ्वीवासी हैं। लेकिन आप कौन हैं ? आपके पूर्वज कौन थे ?" मलक्का वालों ने पूछा।

“हम भी अपने पूर्वजों के वंशज हैं। लेकिन आप आगे से हमारे अंडे नहीं चुरा सकते ।'' बौनों ने कहा।

“इसके लिए तुम लोगों को हमारे साथ नृत्य करना होगा।” मलक्कावासी बोले, “अगर हम जीते तो अंडे ले जाएँगे और अगर आप जीते तो हम आगे कभी यहाँ नहीं आएँगे।”
बौने सहमत हो गए।
नृत्य-प्रतियोगिता शुरू हो गई। दोनों जाति के लोग कई दिनों तक लगातार नाचते रहे।
अंत में, मलक्‍का वाले हार गए। अतः वे अपने गाँव को लौट आए।

बौनों ने तब गुफा के आगे सुपारी का एक पेड़ उगा दिया और उसका मुँह पत्थरों से बंद कर दिया।

तब से मलक्का के लोग पाताल में उतरने का रास्ता भूल गए और कभी वहाँ नहीं जा पाए।

जब पेड़ चलते थे...

 बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे।

उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था। आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे। आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था। पेड उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता।

पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है।

उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी। पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खुब आनन्द करते थे। वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे।

लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर । बुराइयाँ पनप उठीं।

एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे।

पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगे।

पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्न हो उठे। वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है।

उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया।

अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना की। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे।

इस तरह आदमी के भद्दे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया।




अंडमान निकोबार की लोककथा



दो घड़े: बाल कहानी

 एक घड़ा मिट्टी का बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पर रखना चाहा।

पीतलवाले घड़े ने कहा, ''तुम डरो नहीं दोस्‍त, मैं तुम्‍हें धक्‍के न लगाऊँगा।''

मिट्टीवाले ने जवाब दिया, ''तुम जान-बूझकर मुझे धक्‍के न लगाओगे, सही है; मगर बहाव की वजह से हम दोनों जरूर टकराएँगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम्‍हारे बचाने पर भी में तुम्‍हारे धक्‍कों से न बच सकूँगा और मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। इसलिए अच्‍छा है कि हम दोनों अलग-अलग रहें।''

      शिक्षा:- जिससे तुम्‍हारा नुकसान हो रहा हो, उससे अलग ही रहना अच्‍छा है, चाहे वह उस समय के लिए तुम्‍हारा दोस्‍त भी क्‍यों न हो।


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 

तीन मछलियां

 


Hindi Kahani

एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय लम्बी घास व झाड़ियों द्वारा घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था।
उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। अन्ना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। प्रत्यु कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। यद्दी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा।
एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़कर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अतः उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिकाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके ।
एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं।”
मछुआरे पुलकित होकर झाड़ियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।
एक मछुआरा बोला “अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पड़ी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा।” “यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।” दूसरा बोला।
तीसरे ने कहा “आज तो शाम घिरने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे।”
इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछ्लियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी।
अन्ना मछली ने कहा “साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई हैं। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोड़कर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं। उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से। तब तक मैं तो बहुत दूर अटखेलियां कर रही हो-ऊंगी।’
प्रत्यु मछली बोली “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहां हैं, जो इतना घबराने की जरुरत है हो सकता है संकट आए ही न। उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है। उनकी बस्ती में आग लग जाए। भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता हैं या रात को मूसलाधार वर्षा आ सकती हैं और बाढ में उनका गांव बह सकता हैं। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में ही न फंसूं।”
यद्दी ने अपनी भाग्यवादी बात कही “भागने से कुछ नहीं होने का। मछुआरों को आना हैं तो वह आएंगे। हमें जाल में फंसना हैं तो हम फंसेंगे। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?”
इस प्रकार अन्ना तो उसी समय वहां से चली गई। प्रत्यु और यद्दी जलाशय में ही रही। भोर हुई तो मछुआरे अपने जाल को लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने । प्रत्यु ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने । उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं।
जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सड़ने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में प्रत्यु फंस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, परन्तु प्रत्यु दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही। मछुआरे को सड़ांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पड़ी प्रत्यु को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड़ चुकी हैं।” ऐसे बड़बड़ाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने प्रत्यु को जलाशय में फेंक दिया।
प्रत्यु अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई।
यद्दी भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली यद्दी ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।

सीख :
भाग्य भी उन्ही का साथ देता है जो कर्म में विश्वास रखते हैं और कर्म को प्रधान मानते हैं। भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने वाले का विनाश निश्चित है।



  • बाल कहानी: जब शेर जी उठा




     एक नगर में चार मित्र रहते थे । उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धिरहित थे; चौथा वैज्ञानिक नहीं था, किन्तु बुद्धिमान् था । चारों ने सोचा कि विद्या का लाभ तभी हो सकता है, यदि वे विदेशों में जाकर धन संग्रह करें । इसी विचार से वे विदेशयात्रा को चल पड़े ।


    कुछ़ दूर जाकर उनमें से सब से बड़े ने कहा-"हम चारों विद्वानों में एक विद्या-शून्य है, वह केवल बुद्धिमान् है । धनोपार्जन के लिये और धनिकों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये विद्या आवश्यक है । विद्या के चमत्कार से ही हम उन्हें प्रभावित कर सकते हैं । अतः हम अपने धन का कोई भी भाग इस विद्याहीन को नहीं देंगे । वह चाहे तो घर वापिस चला जाये ।"


    दूसरे ने इस बात का समर्थन किया । किन्तु, तीसरे ने कहा- "यह बात उचित नहीं है । बचपन से ही हम एक दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी रहे हैं । हम जो भी धन कमायेंगे, उसमें इसका हिस्सा रहेगा । अपने-पराये की गणना छो़टे दिल वालों का काम है । उदार-चरित व्यक्तियों के लिये सारा संसार ही अपना कुटुम्ब होता है । हमें उदारता दिखलानी चाहिये ।"


    उसकी बात मानकर चारों आगे चल पडे़ । थोड़ी दूर जाकर उन्हें जंगल में एक शेर का मृत-शरीर मिला । उसके अंग-प्रत्यंग बिखरे हुए थे । तीनों विद्याभिमानी युवकों ने कहा, "आओ, हम अपनी विज्ञान की शिक्षा की परीक्षा करें । विज्ञान के प्रभाव से हम इस मृत-शरीर में नया जीवन डाल सकते हैं ।" यह कह कर तीनों उसकी हड्डियां बटोरने और बिखरे हुए अंगों को मिलाने में लग गये । एक ने अस्थिसंचय किया, दूसरे ने चर्म, मांस, रुधिर संयुक्त किया, तीसरे ने प्राणों के संचार की प्रक्रिया शुरु की । इतने में विज्ञान-शिक्षा से रहित, किन्तु बुद्धिमान् मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा - "जरा ठहरो । तुम लोग अपनी विद्या के प्रभाव से शेर को जीवित कर रहे हो । वह जीवित होते ही तुम्हें मारकर खाजायेगा ।"


    वैज्ञानिक मित्रों ने उसकी बात को अनसुना कर दिया । तब वह बुद्धिमान् बोला - "यदि तुम्हें अपनी विद्या का चमत्कार दिखलाना ही है तो दिखलाओ । लेकिन एक क्षण ठहर जाओ, मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊँ ।" यह कहकर वह वृक्ष पर चढ़ गया ।


    इतने में तीनों वैज्ञानिकों ने शेर को जीवित कर दिया । जीवित होते ही शेर ने तीनों पर हमला कर दिया । तीनों मारे गये ।


    अतः शास्त्रों में कुशल होना ही पर्याप्त नहीं है । लोक-व्यवहार को समझने और लोकाचार के अनुकूल काम करने की बुद्धि भी होनी चाहिये । अन्यथा लोकाचार-हीन विद्वान् भी मूर्ख-पंडितों की तरह उपहास के पात्र बनते हैं ।


    समाप्त



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    बाल कहानी: खटमल और बेचारी जूं

     



       एक राजा के शयनकक्ष में मंदरी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती।

    संयोग से एक दिन अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसने अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था।

    लेकिन खटमल भी कम चतुर न था, बोलो, ‘‘देखो, मेहमान से इसी तरह बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’ जूं अततः खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई और उसे शरण देते हुए बोली, ‘‘ठीक है, तुम यहां रातभर रुक सकते हो, लेकिन राजा को काटोगे तो नहीं उसका खून चूसने के लिए।’’

    खटमल बोला, ‘‘लेकिन मैं तुम्हारा मेहमान है, मुझे कुछ तो दोगी खाने के लिए। और राजा के खून से बढ़िया भोजन और क्या हो सकता है।’’

    ‘‘ठीक है।’’ जूं बोली, ‘‘तुम चुपचाप राजा का खून चूस लेना, उसे पीड़ा का आभास नहीं होना चाहिए।’’

    ‘‘जैसा तुम कहोगी, बिलकुल वैसा ही होगा।’’ कहकर खटमल शयनकक्ष में राजा के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

    रात ढलने पर राजा वहां आया और बिस्तर पर पड़कर सो गया। उसे देख खटमल सबकुछ भूलकर राजा को काटने लगा, खून चूसने के लिए। ऐसा स्वादिष्ट खून उसने पहली बार चखा था, इसलिए वह राजा को जोर-जोर से काटकर उसका खून चूसने लगा। इससे राजा के शरीर में तेज खुजली होने लगी और उसकी नींद उचट गई। उसने क्रोध में भरकर अपने सेवकों से खटमल को ढूंढकर मारने को कहा।

    यह सुनकर चतुर खटमल तो पंलग के पाए के नीचे छिप गया लेकिन चादर के कोने पर बैठी जूं राजा के सेवकों की नजर में आ गई। उन्होंने उसे पकड़ा और मार डाला।


    सीख : हमें अजनबियों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उनपर भरोसा नहीं करना चाहिए अपितु उनसे सावधान ही रहना चाहिए।



    कक्षा 4, फुलवारी अर्द्धवार्षिक परीक्षा पेपर

     

    विषय:- फुलवारी
    कक्षा 4
    सभी प्रश्नों के उत्तर सुंदर अक्षरों में अपनी उत्तर पुस्तिका पर लिखिए:-
    प्रश्न 1उत्तर दीजिए
    (क)जंगल के जानवर शेर से क्यों डरते थे?
    (ख)गुफा के भीतर से क्या आवाज आई..?
    (ग)चिड़िया के लिए दुख की बात क्या है?
    (घ)लोककथा में किस तरह के लोगों पर व्यंग्य किया गया है?
    (च)सुंदर लिखावट के बारे में गांधी जी के क्या विचार थे?
    प्रश्न 2.निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए:-
    (क)जो पिता का भक्त हो।
    (ख)जो सत्य बोलता हो।
    (ग)जिसे सत्य प्यारा हो।
    (घ)सत्य के लिए आग्रह।
    प्रश्न 3.निम्नलिखित के दो-दो समानार्थी लिखिए।
    (क)चंद्रमा
    (ख)धरती
    (ग)जल
    (घ)फूल
    प्रश्न 4.निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए:-
    (क)रुचि
    (ख)न्याय
    (ग)दिन
    (घ)ऊंचा
    प्रश्न 5.निम्नलिखित शब्दों में से संज्ञा शब्दों को अलग कीजिए:-
    राम, बस्ती, जाना, मोहन, हंसना, खाना, सीता,।
    प्रश्न 6.अपनी पुस्तक से एक कविता लिखिए।
    प्रश्न 7.मेरा विद्यालय विषय पर निबंध लिखिए।

    पर्यावरण कक्षा 4 , अध्याय-1, हमारी पहचान- हमारा परिवार।








      1. नीचे लिखे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
    प्रश्न 1(क). परिवार से आप क्या समझते हैं?
    उत्तर 1(क) हम जिन लोगों के साथ रहते हैं, वही हमारा परिवार है।

    प्रश्न 1(ख). परिवार हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
    उत्तर 1(ख). परिवार में रहकर हमारी ज़रूरतें पूरी होती हैं।सभी एक दूसरे से स्नेह करते हैं। परेशानी के समय एक दूसरे की सहायता करते
    हैं। परिवार के लोग हर प्रकार से हमारी सुरक्षा करते हैं। परिवार के लोगों से हम सीखते हैं एक दूसरे की सलाह पर काम करते हैं । मिलजुल कर घर के काम निपटाते हैं , त्यौहार मनाते हैं और परिवार से हमें पहचान भी मिलती है इसीलिए परिवार हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

    प्रश्न 1(ग). हमें अपने परिवार के लिए क्या-क्या करना चाहिए?
    उत्तर 1(ग). हमें अपने परिवार के कामों में सहयोग करना चाहिए। बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। किसी के बीमार होने पर उसकी देखभाल करनी चाहिए तथा एक दूसरे के साथ विनम्रता का व्यवहार करना चाहिए।

    2. अंतर स्पष्ट कीजिए -
    2 (क) संयुक्त परिवार 
    2 (ख) एकाकी परिवार 
    उत्तर: -
    संयुक्त परिवार और एकाकी परिवार में अंतर- 
    1. संयुक्त परिवार में लोगों की संख्या ज्यादा होती है जबकि एकाकी परिवार में कम लोग होते हैं।
    2. संयुक्त परिवार में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी, चाचा- चाची , ताऊ - ताई और उनके बच्चे होते हैं । सभी एक साथ एक ही घर में रहते हैं जबकि एकाकी परिवार में सिर्फ़ माता-पिता और उनके बच्चे होते हैं।




    पाठ 6 खेत से बाज़ार तक

     प्रश्न 1.प्रश्नों के उत्तर लिखिए- प्रश्न. आपके आसपास के क्षेत्र में कौन-कौन सी फसलों की खेती होती है? उत्तर. हमारे आसपास मुख्य रूप से धान, ...