Wikipedia

खोज नतीजे

पाठ 6 खेत से बाज़ार तक

 प्रश्न 1.प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न. आपके आसपास के क्षेत्र में कौन-कौन सी फसलों की खेती होती है?

उत्तर. हमारे आसपास मुख्य रूप से धान, गेहूं, गन्ना, सरसों इत्यादि की खेती होती है । इसके अतिरिक्त तरह-तरह की सब्जियां जैसे आलू , टमाटर,  गोभी,  बैगन, मूली,  गाजर इत्यादि, साथ में दलहन फसलें जैसे- अरहर, मसूर, मटर, उड़द आदि की खेती होती है । हमारे आसपास कुछ फलों की भी खेती होती है जैसे- केले की खेती, आम की खेती, अमरूद की खेती और कहीं-कहीं नींबू भी उगाए जाते हैं।


प्रश्न. धान की पिटाई कैसे की जाती है?

उत्तर. धान की फसल पक जाने पर उसे काटकर धूप में सुखाते हैं। उसके बाद लकड़ी के पट्टे पर पीट-पीट कर धान को अलग किया जाता है आजकल यह काम मशीन के द्वारा भी किया जाता है।


प्रश्न. किसी एक फसल को बोने से लेकर बाजार में बेचने तक की प्रक्रिया को लिखिए।

उत्तर. धान की खेती:- धान खरीफ़ की मुख्य फसल है। धान की फसल तैयार करने के लिए सबसे पहले धान के बीजों को अंकुरित करके धान की नर्सरी (बेहन) तैयार किया जाता है लगभग 25 से 30 दिन के बाद, खेत में पानी भर के तैयार बेहन को उसमें रोपा जाता है। कुछ दिनों के बाद धान के साथ उग आए खरपतवार को निराई करके खेत से बाहर निकाला जाता है । इसके बाद समय-समय पर सिंचाई की जाती है। कुछ दिनों बाद धान की फसल पक जाने पर उसे काट कर धूप में सुखाया जाता है। बाद में लकड़ी के पट्टे पर पीट-पीट कर धान को अलग किया जाता है और अंत में इकट्ठा की गई धान की फसल को मंडी तक पहुंचाया जाता है।


किसान / बड़ों से पता करके लिखिए- 

प्रश्न. गेहूं की बुवाई एवं कटाई किस माह में की जाती है?

उत्तर. गेहूं की बुवाई प्रायः दो समय - अवधि में की जाती है- 1) अगेती गेहूं और 2) पछेती गेहूं। अगेती गेहूं की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक होती है . वही पछेती गेहूं की बुवाई अक्सर किस गन्ना और आलू की खुदाई करने के बाद करते हैं जिसकी बुवाई 15 दिसंबर से 15 जनवरी तक होती है।

  गेहूं की फसल तैयार होने का समय गेहूं के किस्मों पर निर्भर करता है. इसके कटाई की बात करें तो आमतौर पर मध्य मार्च से आधे अप्रैल के बीच की जाती है. कई बार अप्रैल के आखिर तक भी कटाई की जाती है।


प्रश्न. गेहूं की फसल खराब होने के क्या-क्या कारण होते हैं?

उत्तर. वैसे तो गेहूं की फसल को खराब करने में रतुवा (गेरुआ) नामक रोग सबसे अधिक भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त तेज हवा, बारिश और ओले पड़ने के कारण भी फसल ख़राब हो जाती है।


प्रश्न. इनको खराब होने से बचने के लिए किस क्या-क्या तरीके अपनाते हैं?

उत्तर. गेहूं की फसल को रोग से बचाने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके गेहूं की बुवाई की जाती है। पाले से बचाने के लिए किसान फसल में हल्की सिंचाई करते हैं । शाम के समय सूखी घास फूस एवं उपलों को जलाकर उसका धुआं करते हैं ।


प्रश्न . गेहूं की फसल कितने दिनों में पक जाती है?

उत्तर. सामान्य बुवाई (अगेती) में इसके पकने का समय 120 से 125 दिन है जबकि पिछेती बुवाई में यही किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है ।


3. खोजबीन

प्रश्न. आपके मन में खेती से जुड़े क्या-क्या सवाल उठते हैं? कुछ सवालों की सूची बनाइए और अपने पिताजी या किसान से पूछिए।

उत्तर. विद्यार्थी स्वयं अपने प्रश्नों को अपने बड़े बुजुर्गों से पूछ कर उत्तर प्राप्त करें।


प्रश्न. खेती में काम आने वाले कुछ औजारों के नाम अपने बड़ों से पूछ कर लिखिए और उनके चित्र बनाइए।

उत्तर. खेती में काम आने वाले कुछ प्रमुख औजार हैं -  कुदाल, फावड़ा, खुरपी, हंसिया, गंडासा आदि। विद्यार्थी इन औजारों के चित्र अपनी उत्तर पुस्तिका पर बनाएं।


समाप्त

पर्यावरण कक्षा 4, पाठ 4, हमारा भोजन, अभ्यास प्रश्नों का हल

 प्रश्न.1 पौधों से प्राप्त होने वाले किन्ही चार भोज्य पदार्थों के नाम लिखिए?

उत्तर.1 पौधों से प्राप्त होने वाले चार भोज्य पदार्थ निम्नलिखित हैं -

1) तरह-तरह के अनाज, जैसे- गेहूं, ज्वार, मक्का, धान आदि।

2) तरह-तरह की दालें, जैसे- चना, अरहर, मूंग, मसूर आदि।

3) विभिन्न प्रकार की सब्जियां, जैसे- आलू, लौकी, टमाटर, गाजर आदि।

4) तरह-तरह के फल, जैसे- सेव, आम, केला, अमरूद आदि।


प्रश्न 2. जंतुओं से प्राप्त होने वाले किन्ही चार भोज्य पदार्थों के नाम लिखिए?

 उत्तर 2. जंतुओं से प्राप्त होने वाले चार प्रमुख पदार्थ निम्नलिखित हैं -

1) अंडा  2) दूध  3) मांस  4) मछली।


प्रश्न 3. रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए-

क) भोजन से हमें ऊर्जा मिलती है।

 ख) भोजन के रूप में जिन्हें हम कहते हैं वह भोज्य पदार्थ कहलाते हैं।

 ग) भोजन के प्रमुख स्रोत पौधे और जंतु हैं।


प्रश्न 4. सही कथन के सामने (✓) और गलत के सामने (×) का निशान लगाएं-

क) अनाज दालें व सब्जियां पौधों से प्राप्त होती हैं। (✓)

ख) गेहूं की बुआई ग्रीष्म ऋतु में करते हैं ।(×)

ग ) स्वस्थ रहने के लिए संतुलित भोजन करना चाहिए।(✓)


प्रश्न 5. क) अपने दादा-दादी या मम्मी पापा से पूछिए कि जब वे आपकी उम्र के थे तो क्या खाते थे? अब लिखिए कि आप अपने दादा-दादी से क्या-क्या भिन्न चीज खाते हैं?

उत्तर 5. क) विद्यार्थी अपने परिवार वालों से पूछ कर इस प्रश्न का उत्तर स्वयं लिखें।


प्रश्न 5 ख) अपने घर में भोजन पकाते समय प्रयोग किए जाने वाले मसालों की सूची तैयार कीजिए।

प्रश्न 5 ख) विद्यार्थी अपने परिवार वालों से बात चीत करके इस प्रश्न का उत्तर स्वयं लिखें।




समाप्त

ज़िन्न




 कमल एक बुद्धिमान युवक था। एक बार वह कहीं जा रहा था। रात होने वाली थी। वह तेज़ी से चलकर जा रहा था। तभी उसने एक हल्की-सी आवाज़ सुनी। कोई कह रहा था - 'बचाओ, बचाओ, मुझे बाहर निकालो।'


कमल ने इधर-उधर देखा। उसे कोई दिखाई नहीं दिया। वह आगे जाने लगा। तभी वही आवाज़ फिर आई। कमल ने ध्यान से देखा तो उसे पेड़ के नीचे एक बोतल पड़ी हुई दिखाई दी। उसे लगा कि आवाज़ बोतल के अंदर से आ रही है। कमल ने बोतल को उठाकर देखा। उसके अंदर उसे एक छोटा-सा चेहरा दिखाई दिया। अंदर कोई बंद था चिल्ला रहा था। 'बचाओ-बचाओ, मुझे यहाँ से बाहर निकालो।'


कमल ने बोतल का ढक्कन खोल दिया। अचानक अंदर से ढेर सारा धुँआ निकला और साथ ही वह व्यक्ति भी। बाहर निकलते ही उसका आकार बहुत बड़ा हो गया। उसने कमल से कहा, 'मैं एक जिन्न हूं। एक दुष्ट जादूगर ने उसे इस बोतल में बंद कर दिया था। अब मैं आज़ाद हो गया हूं। मुझे बहुत भूख लगी है। अब मैं तुम्हें खाऊँगा।'


यह सुनकर कमल थोड़ा घबराया। लेकिन उसने जिन्न को पता नहीें लगने दिया कि उसे डर लग रहा है। उसने जिन्न से कहा, 'तुम मुझे बेवकूफ़ नहीं बना सकते। ज़रा अपना आकार तो देखो। और यह बोतल देखो। तुम इतने बड़े होकर इस बोतल के अंदर भला कैसे आ सकते हो।‘ तुम झूठ बोल रहे हो।'


यह सुनकर जिन्न को गुस्सा आ गया। वह बोला, 'जिन्न कभी झूठ नहीं बोलते। तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है न, ठीक है मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि मैं इस बोतल के अंदर जा सकता हूँ।'


ऐसा कहकर उसने अपना आकार छोटा किया और धुँआ बनकर बोतल के अंदर चला गया।


कमल तो यही चाहता था। उसने झट से बोतल का ढक्कन वापिस लगा दिया।


फिर कमल उस जिन्न से बोला- 'मैं जान गया हूँ कि जिन्न झूठ नहीं बोलते, लेकिन थोड़े बेवकूफ़ जरूर होते हैं। अब तुम यहीं रहो, इसी बोतल के अंदर।'


कमल ने वह बोतल एक पत्थर से बाँधी और समुद्र में फेंक दी। भारी पत्थर से बँधी होने के कारण बोतल पानी में डूब गई और साथ ही जिन्न भी।


एक बात तो तुम समझ गए होगे कि मुसीबत के समय घबराने से कुछ हल नहीं होता। इसलिए अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए, जैसे कमल ने किया।

हाँ दीदी हाँ : उत्तराखंड की लोक-कथा

 किसी पहाड़ी गांव में एक निर्धन किसान का परिवार रहता था। किसान की एक बेटी और एक बेटा था। किसान की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। अपने दोनों बच्चों का लालन पोषण वह स्वयं करता था। समय के साथ साथ बच्चे बड़े हो गये। बेटी बड़ी थी सो किसान को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। उसने पाई पाई जोड़कर जैसे तैसे उसका विवाह कर दिया।


एक दो साल बाद किसान बिमार रहने लगा। और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई । अब उसका बेटा अनाथ हो गया, उसकी दीदी को अब भाई की चिंता सताने लगी। क्योंकि उसका ससुराल भी ज्यादा सम्पन्न नहीं था तो वह अपने सास ससुर व पति से इस बारे में बात करने में संकोच होने लगा। परन्तु भाई की चिंता में उसने हिम्मत बांध के भाई को अपने ससुराल में ही रखने की बात ससुरालियों से की। ससुराल वाले बहू की बात मान तो ली परन्तु कुछ शर्तों के साथ। ये शर्तें थी -

(1) उसके भाई को भोजन में भूसे की रोटी और बिच्छू का साग (बिच्छू एक प्रकार की पहाड़ी घास होती है जो सब्जी बनाने के काम भी आती है)।
(2) उसे चक्की की ओट में सोना होगा,
(3) मवेशियों को चराने की जिम्मेदारी उसकी होगी।

बहन को ये बातें बिल्कुल भी उचित नहीं लगी परन्तु भाई प्रेम और उसकी अकेले रहने की चिंता में उसने यह शर्तें मान ली। भाई ने भी परिस्थिति के अनुसार मन पसीज के यह शर्तें मान ली। अब भाई अपनी बहन के ससुराल में रहने लगा।

धीरे धीरे भाई अब उस परिवेश में घुल मिल गया। वह दिन में मवेशियों को चराने जंगल जाता और रात को भोजन में मिली भूसे की रोटी और बिच्छू की सब्जी खाकर वहीं चक्की की ओट पर टाट बोरी बिछा के सो जाता। ऐसे ही वक्त बीतता गया।

एक दिन मवेशियों को जंगल में चराते चराते उसे एक अंजान व्यक्ति मिला। उस व्यक्ति ने उसे उसके साथ चलने को कहा। पहले तो उसने साथ आने से मना किया परन्तु जब उस अजनबी ने उसे अच्छा काम और अच्छे भविष्य का लोभ दिखाया तो वह सोचने लगा कि बहन के घर में बोझ बनने से अच्छा कहीं और काम करके धन कमाया जाये। उसने साथ चलने की हामी भर दी।

शाम को जब भाई नहीं लौटा तो बहन को चिंता होने लगी। गांव में भी बात फैल गई। उसकी खोजबीन की गई जब वह नहीं मिला तो सबने उसे मृत समझ लिया। बहन बहुत दुखी रहने लगी। उसे यकीन नहीं हुआ कि उसका भाई मर चुका है। खैर दिन महिने साल निकलते रहे। धीरे धीरे वह अपने भाई को भुलाती रही लेकिन तीज त्यौहारों में जब आस पड़ोस की औरतें अपने भाई से मिलने जाती या उनके भाई उनसे मिलने आते तो वह अपने भाई को याद करके आंसू बहाती। ऐसी समय निकलता रहा और एक दिन उसे उसके भाई का संदेश मिला, वह फूली नहीं समाई। जिसे वह मरा समझ चुकी थी वह जिंदा था। वह भाई से मिलने अपने मायके गई।

घर पहुंच कर उसे भाई की संपन्नता देखकर कर आश्चर्य हुआ। भाई ने उसे भूतकाल में जो भी हुआ सब बताया। दोनों एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुये। भाई ने उपहार स्वरूप बहन को बहुत धन दिया लेकिन उसकी बहन ने यह कहकर मना कर दिया कि उसे उसका भाई मिल गया उसे अब कुछ नहीं चाहिये। जब उसने धन लेने से मना किया तो भाई ने उसे दो गायें और एक भैंस देनी चाही। तो बहन ने वह रख ली। भाई खुश हुआ कि बहन ने उसकी एक उपहार स्वीकार कर लिया। उसने गाय के गले में घंटी बांध दी और बहन के साथ भेज दिया।

बहन उन गायें और भैंस के साथ ससुराल को चल दी। सुनसान रास्ते में गाय के गले में बंधी घंटी का स्वर बहन को अच्छा लग रहा था। उसे लगा जैसे घंटी से आवाज आ रही हो-

भूसे की रोटी, सिंसूण की साग खाएगा - हाँ दीदी
चक्की की ओट में सोएगा - हाँ दीदी
झाड़ू की मार सहेगा - हाँ दीदी हाँ ।
घंटी मानो यहीं बाते बोल रही हो यह सोचकर वह जोर जोर से हंस पड़ी।

बीरा बैण (बहन) : उत्तराखंड की लोक-कथा

 बहुत पुरानी बात है। उत्तराखंड के जंगल में एक विधवा बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे और एक प्यारी-सी बेटी थी । बेटी का नाम था बीरा। कुछ दिनों बाद जब बुढ़िया की मृत्यु हो गई, तो उसके ये बच्चे अनाथ हो गए। सातों भाई शिकार खेलने के शौकीन थे।


एक दिन वे सातों भाई मिलकर एक साथ शिकार खेलने निकले। उन्होंने चलते-चलते अपनी बहन बीरा से कहा-तुम हमारे लिए भोजन बनाकर रखना, हम जल्दी लौट कर आ जाएंगे।

भाइयों के जाने के बाद झोंपड़ी में बीरा अकेली रह गई। बीरा ने आग जलाकर खीर बनाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद खीर उबल कर चूल्हे में गिर गई। इससे आग बुझ गई।

बीरा बहुत परेशान हुई। उसके पास माचिस भी नहीं थी, वह आग कैसे जलाती? उसके आस-पास कोई घर भी नहीं था। अब वह आग कहां से मांग कर लाए? वह अपनी झोंपड़ी से निकल कर जंगल में दूर तक निकल गई। देखने लगी कि कोई घर मिले, तो वहां से आग मांग ले।

चलते-चलते उसे एक बड़ा-सा मकान दिखाई दिया। उसने मकान के सामने जाकर उसका दरवाजा खटखटाया। दरवाजा एक औरत ने खोला। औरत ने बीरा को देखकर कहा-‘तुम यहां से चली जाओ। यह राक्षस का घर है। वह अभी आने वाला है। तुम्हें देखेगा, तो तुम्हें खा जाएगा।’

बीरा ने कहा-‘बहन! मुझे थोड़ी-सी आग चाहिए। खाना बनाना है। बड़ी जोर की भूख लगी है।’

वह औरत राक्षस की पत्नी थी, लेकिन जब बीरा ने उसे बहन कहा, तो उसे बीरा पर दया आ गई। उसने बीरा को जल्दी से थोड़ी-सी आग दे दी। उसने उसे चौलाई भी दी और कहा-‘तुम यहां से जल्दी निकल जाओ। ऐसा करना कि रास्ते में इस चौलाई के दानों को गिराती जाना। जहां भी दो रास्ते मिलें, वहां के बाद चौलाई मत गिराना। इससे राक्षस रास्ता भटक जाएगा और तुम्हारे घर तक नहीं पहुंच सकेगा। याद रखना इस चौलाई को अपने घर तक मत ले जाना, नहीं तो राक्षस वहीं पहुंच जाएगा।’

बीरा अपने साथ चौलाई ले गई और उसके दाने रास्ते में गिराती गई। वह जल्दी-जल्दी जा रही थी। वह राक्षस की पत्नी की बात भूल गई। उसने पूरे रास्ते पर चौलाई के दारे गिरा दिए। कुछ दाने अपने घर तक भी ले गई।

जब राक्षस अपने घर लौट कर आया, तो उसे मनुष्य की गंध आने लगी। वह समझ गया कि आज जरूर कोई मनुष्य मेरे घर आया है। उसने अपनी पत्नी से पूछा- ‘आदमी की गंध आ रही है, क्या कोई आदमी हमारे घर आया था?’

उसकी पत्नी ने कहा-‘नहीं तो। यहां तो कोई नहीं आया।’

राक्षस ने अपनी पत्नी को पहले तो खूब डांटा। फिर मारना-पीटना शुरू कर दिया। डर के मारे उसकी पत्नी ने राक्षस को बीरा के आने की बात बता दी। सुनते ही वह राक्षस बीरा की तलाश में निकल पड़ा। वह चौलाई के बीज देखता हुआ बीरा की झोंपड़ी तक पहुंच गया। झोंपड़ी में बीरा अकेली थी। तब तक उसके भाई नहीं लौटे थे। उसने अपने भाइयों के लिए खाना बनाकर सात थालियों में परोस कर रखा हुआ था। राक्षस को देखकर वह डर गई और पानी के पीपे में छिपकर बैठ गई। राक्षस ने सारा खाना खा लिया। खाने के बाद वह पानी के पीपे की ओर गया। सारा पानी पीने के बाद उसने खाली पीपे में बैठी बीरा को पकड़ लिया। वह बीरा को जीवित निगल गया।

खा-पीकर राक्षस झोंपड़ी के दरवाजे पर सो गया, क्योंकि उसे बहुत जोर की नींद आ रही थी। जब बीरा के भाई लौटकर आए, तो उन्होंने राक्षस को दरवाजे पर सोते हुए पाया। उन्होंने देखा बीरा घर में नहीं है। वे समझ गए कि जरूर इस राक्षस ने हमारी बीरा बहन को खा लिया है। उन्होंने तुरंत राक्षस के हाथ-पैर काट डाले। फिर उसका पेट फाड़ दिया। राक्षस मर गया और उसके पेट से बीरा भी निकल आई।

इसके बाद वे भाई-बहन सुख पूर्वक रहने लगे। जब भी वे कभी बाहर जाते, तो कोई न कोई भाई बीरा के पास जरूर रह जाता था।

फूलों की घाटी : उत्तराखंड की लोक-कथा

 बहुत पुरानी बात है। हिमालय पर्वत की घाटी में एक ऋषि रहते थे। वे गोरे-चिट्टेथे, उनकी श्वेत धवल दाढ़ी था और कंद, मूल, फल खाते थे । अपना अधिक समय वह तपस्या में व्यतीत करते थे। कभी-कभी बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच अकेले वह उदास हो जाते। उदासी तोड़ने के लिए अक्सर वह जोर से बोलने लगते। उन्हीं की आवाज ऊंचे पर्वतों से टकराकर लौट आती। दूर-दूर तक नजर दौड़ाकर वह कुछ खोजने लगते। चारों ओर दूध-सी सफेद बर्फ ही दिखाई देती। उनका मन और उदास हो जाता।


एक दिन उन्होंने ध्यान लगाकर भगवान से कहा, ‘प्रभु कभी-कभी मन नहीं लगता, सूने पहाड़ की उदासी काटने लगती है। कुछ कृपा करो।’

ऋषि अभी ध्यानमग्न ही थे, तभी उन्हें छम-छम करती पायल की झंकार सुनाई दी। उन्होंने आंखे खोलीं। देखा, हिम-सी एक बालिका श्वेत वस्त्रों से सजी सामने खड़ी थी। मंत्रमुग्ध ऋषि ने दौड़कर बच्ची को गोद में उठा लिया। उनका हृदय पुलकित हो उठा। खुशी में आंखों से आंसू बहने लगे।
ऋषि के आंसू बहते देख, बच्ची मीठी वाणी में बोली, ‘बाबा रोते क्यों हो?’
‘मैं रो नहीं रहा हूं। ये खुशी के आंसू हैं मेरी बच्ची। बताओ, तुम कहां से आई हो? तुम्हारा नाम क्या है? तुम किसकी बेटी हो?’ ऋषि ने पूछा।
बच्ची बोली, ‘मैं नीचे की घाटियों से आई हूं। मेरी मां ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मेरी मां का नाम प्रकृति है। मेरा नाम है सुषमा।’
‘तुम कब तक मेरे पास रहोगी? मुझे लगता है, अब एक बार तुम्हें पा लिया तो मैं एक क्षण भी तुम्हारे बिना न रह सकूंगा। अब तुम मुझे छोड़कर कभी न जाना।’ कहते हुए वृद्ध ऋषि विभोर हो गए।

‘मैं तुम्हारे पास ही रहूंगी बाबा। मेरी मां ने कहा है, उदास ऋषि के चारों तरफ खुशी बिखेर देना, ताकि कभी किसी को भी भविष्य में हिमालय में उदासी न घेरे। मैं कभी भी तुम्हें छोड़कर न जाऊंगी। आज से तुम मेरे बाबा हो। यह हिमालय मेरा घर है।’ बच्ची ने कहा। ऋषि प्रसन्न थे। वह बच्ची का हाथ थामे, बर्फानी पर्वतों पर घूमते। कभी उसे गोद में लिए मीलों चलते। दोनों प्रसन्न थे। अक्सर ऋषि बालिका को कथा सुनाते।

एक दिन ऋषि ने बालिका को हंसने वाली मनोरंजक कथा सुनाई, तो वह खिलखिला कर हंस दी। जब वह खिलखिल हंस रही थी, तो ऋषि उसी तरफ देख रहे थे। बच्ची की हंसी के साथ रंग-बिरंगे, सुंदर फूल झर रहे थे। वह मंद हवा के साथ दूर-दूर तक फैलते जा रहे थे। थोड़ी देर में बच्ची ने हंसना बंद किया। तब तक दूर-दूर तक फूल ही फूल धरती पर उग आए थे। ऋषि ने दूर तक देखा और मुसकुराकर कहा, ‘यही है फूलों की घाटी। इस धरती का स्वर्ग।’

फूलों के सौंदर्य में डूबे ऋषि बालिका के साथ घूमते रहे। एक दिन उनकी अंगुली पकड़े बालिका ठुमक-ठुमक कर चल रही थी, तभी एकाएक उसका पैर फिसला और उसे चोट आ गई। कोमल तो वह थी ही। ऊं…ऊं… करके रोने लगी। बड़ी-बड़ी आंखों से मोती से आंसू ढुलक-ढुलक कर धरती पर गिरने लगे। ऋषि ने उसे संभाला। चोट को सहलाया। बच्ची चुप हुई, तो ऋषि ने देखा कि जहां-जहां आंसू की बूंदे गिरी थीं, वहां जल धाराएं बह रही हैं। निर्झर झर रहे हैं। ऋषि जैसे तृप्त हो गए, उस दृश्य को देखकर।

सचमुच बच्ची ने ऋषि की उदासी मिटा दी। मुदित मन से ऋषि उसे लिए ऊंची चोटियों पर, यहां से वहां जाते। जहां बच्ची हंसती, वहां फूल बिखर जाते, जहां रोती, वहां झरने बहते, अब सुंदरता हिमालय पर सर्वत्र छा गई। ऋषि की उदासी दूर हो गई। बाबा और बच्ची दोनों मगन थे।

समय बीतने लगा। बहुत-बहुत वर्षों बाद बर्फानी पर्वतों, फूलों की घाटियों और नदी-झरनों के नीचे की घाटियों में रहने वालों को इस अनोखे सौंदर्य की खबर मिली। वे लोग मार्ग खोज-खोज कर ऊपर जाने लगे। कठिन मार्ग में उन्हें थकावट लगती, कष्ट होता, पर ऊपर पहुंचकर सब भूल जाते। धीरे-धीरे अपने मार्ग के कष्ट को दूर करने के लिए उन्होंने अच्छा सुगम मार्ग बनाने का विचार किया। हरी-भरी धरती पर लगे कुदाल चलाने। कभी सह लेती धरती मां, पर कभी गुस्से से गरज पड़ती और पहाड़ टूट जाते। हरियाली पर टूटा पहाड़ मनुष्य की निर्दयता की कहानी कहता।

लोग आने लगे, ऋषि और बालिका ऊंची-ऊंची चोटियों की ओर बढ़ने लगे। वे जहां जाते, सूखे पर्वत सौंदर्य से भर जाते। इस तरह ऋषि ने सुषमा को साथ लगाकर हिमालय को स्वर्ग के समान बना दिया। आज ऋषि नहीं है, मगर हिमालय के झरनों, हरे मैदानों और फूलों की घाटी के रूप में सुषमा चारों ओर जैसे हंसती-मुसकुराती ऋषि की कहानी कहती दीख पड़ती है।

धान की कहानी : उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

 एक बार ब्राह्मण टोला के निवासियों को किसी दूर गांव से भोजन के लिए निमंत्रण आया। वहां के लोग बहुत प्रसन्न हुए और जल्दी-जल्दी दौड़-भागकर उस गांव में पहुंच गए। वहां सबने जमकर भोजन का आनन्द उठाया। खूब छककर खाया।


भोजन करने के बाद सब लोग अपने घर की ओर चल दिये। पैदल ही चले क्योंकि सवारी तो थी नहीं। रास्ते में चावल के खेत लहलहा रहे थे। यह देखकर उनमें से किसी से रहा नहीं गया।

सबने आव देखा ना ताव और टूट पडे चावल पर। हाथ से चावल के बाल अलग करते, और मुंह में डाल लेते। उसी रास्ते से शिव व पार्वती भी जा रहे थे। इस तरीके से उन लोगों को खाते देख पार्वती ने शिवजी से कहा- 'देखिए, ये लोग भोज खाकर आ रहे हैं, फिर भी कच्चे चावल चबा रहे हैं।'

शिवजी ने पार्वती की बात अनसुनी कर दी । पार्वती ने सोचा, मैं ही कुछ करती हूं। सोच-विचार के बाद उन्होंने शाप दिया कि चावल के ऊपर छिलका हो जाए। तभी से खेतों में चावल नहीं धान उगने लगे।

पाठ 6 खेत से बाज़ार तक

 प्रश्न 1.प्रश्नों के उत्तर लिखिए- प्रश्न. आपके आसपास के क्षेत्र में कौन-कौन सी फसलों की खेती होती है? उत्तर. हमारे आसपास मुख्य रूप से धान, ...